राजस्थानी पुस्तकों के लोकार्पण में चारण बोले, राजस्थानी लोक साहित्य आज भी प्रासंगिक

साहित्य में समसामयिक विषय – विमर्श जरूरी है : मधु आचार्य ‘आशावादी ‘

आरएनई, बीकानेर। लोक कल्पना नहीं करता बल्कि वो अपने अनुभव से प्रमाणित करता है। लोक सृष्टि का प्रामाणिक आधार है। जो ज्ञान किसी शास्त्र में नहीं वो लोक में मिलता है इसलिए सभी शास्त्र लोक पर विशेष ध्यान देते है। राजस्थानी लोक साहित्य सम्पूर्ण विश्व में अद्भुत, प्रामाणिक और वैज्ञानिक है।

राजस्थानी लोक आज भी प्रासंगिक है। यह विचार ख्यातनाम कवि-आलोचक प्रोफेसर (डाॅ.)अर्जुनदेव चारण ने संत श्री रावतराम सेवा समिति के तत्वावधान में डाॅ. जितेन्द्रसिंह साठीका कृत ‘ राजस्थानी लोक जीवन में सुगन परम्परा ‘ एवं डाॅ.अमित गहलोत कृत ‘ राजस्थानी साहित्य में शक्ति उपासना ‘ के लोकार्पण समारोह में अपने अध्यक्षीय उदबोधन में कही। उन्होंने कहा कि हमारे लोक जीवन में सुगन विचार तथा लोक देवियों की पावन परम्परा बहुत समृद्ध तथा अद्भुत है।

संत श्री रावतराम सेवा समिति के सचिव यशवंतसिंह गहलोत ने बताया कि लोकार्पण समारोह में प्रतिष्ठित कवि-कथाकार अर नाट्य निर्देशक मधु आचार्य आशावादी ने अपने मुख्य आतिथ्य उदबोधन में कहा कि साहित्य सदैव वर्तमान में जीता है मगर उसका जीना तभी सार्थक है जब उसके साथ उसका भूतकाल हो, तभी भविष्य पर उसकी दृष्टि सही और साफ रहती है। किसी भी साहित्य व भाषा का विकास केवल कविता, कहानी आदि से नहीं होता, विमर्श के साहित्य से होता है। उस दृष्टि से ये दोनों पुस्तकें महत्त्वपूर्ण है, और राजस्थानी साहित्य में यह पहला सकारात्मक प्रयास है।

जेएनवीयू कलां संकाय के अधिष्ठाता प्रोफेसर (डाॅ.) के.एल.रैगर ने कहा कि राजस्थानी भाषा विश्व की समृद्धतम भाषाओं में एक है। इसका विपूल साहित्य भंडार है। मातृभाषा राजस्थानी हमारी अस्मिता से जुड़ी हुई है मगर इसे संवैधानिक मान्यता नहीं मिलना प्रदेशवासियों का दुर्भाग्य ही माना जायेगा। जेएनवीयू राजस्थानी विभागाध्यक्ष डाॅ.गजेसिंह राजपुरोहित ने कहा कि राजस्थानी भाषा-साहित्य का भविष्य युवा पीढी पर निर्भर है। आज राजस्थान का युवा अपनी मातृ भाषा के प्रति समर्पित भाव से सकारात्मक कार्य कर रहा है जो हम सभी के लिए प्रसन्नता और गर्व की बात है। एस.बी.आई.बैंक के मुख्य प्रबंधक कुलदीप सांखला ने कहा कि मातृ भाषा दिवस पर राजभाषा की भांति ही राजस्थानी में साहित्यिक आयोजन किये जाने चाहिए। उन्होंने युवा रचनाकारों के सकारात्मक कार्यो को खूब सराहा।

समारोह समिति के सचिव डाॅ. भींवसिंह राठौड ने बताया कि इस अवसर पर युवा रचनाकार महेन्द्रसिंह छायण ने ‘ राजस्थानी लोक जीवन अर सुगन परम्परां ‘ तथा कवि – समीक्षक वाजिद हसन काजी ने – ‘ राजस्थानी साहित्य में शक्ति उपासना ‘ पुस्तक पर आलोचनात्मक पत्र-वाचन किया। समारोह के प्रारम्भ में अतिथियों द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर दीप प्रज्ज्वलित किया गया। राजस्थानी परम्परानुसार अतिथियों के स्वागत पश्चात नवोदित रचनाकार डाॅ. जितेन्द्रसिंह साठीका एवं डाॅ.अमित गहलोत का राजस्थानी रचनाकारों द्वारा अभिनंदन किया गया। समारोह में श्री मीठेश निर्मोही, जसवंतसिंह इंदा, डाॅ.संगीता आर्य, डाॅ. महेन्द्रसिंह कच्छवाह, डाॅ. सीमा, डाॅ.कप्तान बोरावड़, डाॅ. अशोक गहलोत, सुश्री नीतू राजपुरोहित, डाॅ. कुलदीप सिंह गहलोत, विजय नाहटा, डाॅ. मनोज सिंह सहित राजस्थानी भाषा-साहित्य के अनेक प्रतिष्ठित रचनाकार, शोध-छात्र, विधार्थी एवं साहित्य प्रेमी मौजूद रहे। संचालन युवा लेखक डाॅ. इन्द्रदान चारण ने किया।

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