साहित्य की ‘गीता‘ ‘प्रेस‘ से, हर घर पहुंचाने जूझ रहा एक ‘पोद्दार‘

आसान नहीं है, हर-घर यूं कथारंग पहुंचाना

धीरेन्द्र आचार्य
कथारंग का छठा वार्षिक अंक आ रहा है। इसमें 75 लेखिकाएं और इतने ही लेखक हैं। देशभर के ख्यातनाम लेखकों से लेकर बीकानेर के चुनिंदा सृजनकर्मी तक शामिल है। ममता कालिया जैसी प्रख्यात लेखिका उम्र से जुड़ी तकलीफों को धता बता सबकुछ सहते हुए लोकार्पण समारोह में शामिल होने बीकानेर आ रही है। सृजन से जुूड़े हर कर्म को प्रोत्साहित करने वाले अर्जुनदेव चारण, मधु आचार्य का सान्निध्य तो मिलता ही है, इस समारोह को भी मिलेगा।
सोशल मीडिया पर बहती सूचनाओं की ये धाराएं यूं तो शांत, सुकूनदायी लगती है लेकिन एक डुबकी इसकी गहराई में लगाकर देखें या बहाव के स्रोत की ओर झांके तो पता चलता है कि इन्हें प्रवाहमय रखने के लिए कितने गड्ढ़ों को पाटना पड़ रहा है। कितनी चट्टानें रूकावट बनकर सामने आ रही है। कइयों को दरकिनार कर रास्ता बदलना पड़ा है तो कुछ को बहाव के साथ ढालकर शालिग्राम बना किसी तट पर स्थापति कर दिया गया। इसके किनारे कहानियों के खेत लहलहाने लगे हैं। कविताओं की फुलवारियाां खिली हैं। घर-घर पहुंच रहा है इसका गंगाजल क्योंकि ध्येय है-जन तक सृजन।
यह सब होते हुए देखकर भी बहुत कुछ ऐसा अनदेखा रह जाता है जिससे पग-पग पर जूझना पड़ता इसे गतिमान बनाए रखने वालों को।
सीधे तौर पर कहूं तो इस दौर में आसान नहीं 500 पेज की इतनी बड़ी साहित्यिक पत्रिका हर साल निकालना जिसमें देशभर के साहित्यकारों की श्रेष्ठ रचनाएं समाहित हो। आसान क्यों नहीं है? सवाल के जवाब में किसी ब्रांड या प्रकाशन पर टिप्पणी कर रहा हूं तो बस, बात को समझने के लिए कि इंडिया टुडे, मनोरमा जैसे बड़े प्रकाशनों ने साहित्य वार्षिकी निकालना बंद कर दिया। पता चला कि ये आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं है। जब इतने बड़े कारपोरेट घराने इससे बचकर निकलने की कोशिश कर रहे हैं तब एक हरीश बी.शर्मा जैसा कम संसाधनों वाला शख्स छोटे-से शहर में यह सब कैसे मैनेज कर रहा है? सवाल पत्रकारिता करने वाले दिमाग में बार-बार कौंधा।
बस, इसी कहानी की तलाश में कथारंग के स्रोत और गहराई में झांकने का प्रयास किया। जो पाया वह लिखना या बताना बहुत विस्तृत हो सकता है। lहो सकता है यह कहने, लिखने, सुनने, पढ़ने में थोड़ी अतिशयोक्ति लगे लेकिन जिस तरह हरीश बी.शर्मा को जूझते देखा, यूं लगा जैसे फिर कोई ‘पोद्दार‘ ठान बैठा है कि साहित्य की ‘गीता‘ को ‘प्रेस‘ से निकालकर हर घर पहुंचाना है। बस, धीरे-धीरे सहयोगी जुट रहे हैं। टीम बन रही है। जन-तक सृजन के ध्येय के साथ साहित्य की गंगा का गंगाजल घर-घर पहुंचाने की तैयारी चल रही है।

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